किसान आज सरकार से बातचीत के न्योते पर फैसला ले सकते हैं
Farmers can decide on the invitation of talks with the government today

किसान आज सरकार से बातचीत के न्योते पर फैसला ले सकते हैं

नई दिल्ली

कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों के आंदोलन का आज 30वां दिन है यानी किसान आंदोलन को आज एक महीना हो गया। लेकिन इस मसले को लेकर किसान और सराकर के बीच अबतक बात नहीं बन पाई है और गतिरोध लगातार बना हुआ है। कड़ाके की सर्दी और  गिरते पारे के साथ-साथ कोरोना के खतरों के बीच 26 नवंबर से बड़ी तादाद में किसान दिल्ली के अलग-अलग बॉर्डर पर डटे हैं। प्रदर्शनकारी किसान सिंधु, टिकरी, पलवल, गाजीपुर सहित कई बॉर्डर पर डटे हुए हैं।

खबरों के मुताबिक किसान आज सरकार से बातचीत के न्योते पर फैसला ले सकते हैं। आपको बात दें सरकार की तरफ से गुरुवार को चिट्ठी लिखी गई थी। इसमें कहा कि किसान नेता बातचीत के लिए तारीख और समय तय कर बताएं। लेकिन, मांगें पूरी नहीं होते देख किसानों ने विरोध तेज कर दिया है। हरियाणा में आज से 3 दिन तक टोल फ्री करेंगे।

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इससे पहले किसान संगठनों ने गुरुवार को आरोप लगाया कि वार्ता के लिए सरकार का नया पत्र कुछ और नहीं, बल्कि किसानों के बारे में एक दुष्प्रचार है ताकि यह प्रदर्शित किया जा सके कि वे बातचीत को इच्छुक नहीं हैं।

सरकार और किसानों के बीच बातचीत भी हुई लेकिन तमाम कोशिशें बेनतीजा रहीं। किसान तीन नए कृषि कानूनों को पूरी तरह हटाने की मांग कर रहे हैं। सरकार कानूनों को हटाने की जगह उनमें संशोधन करने की बात कह रही है। जिद पर अड़े किसान संगठन कानून वापसी से कम पर मानने को तैयार नहीं हैं। वे सरकार के साथ वार्ता तक को तैयार नहीं हो रहे हैं। 

किसानों अरियल रुख का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि सरकार को छठे दौर की बातचीत के न्यौते के बावजूद किसान संगठन अबतक तैयार नहीं हुए है। किसान संगठन कृषि कानूनों को रद करने और न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की गारंटी देने की मांग से नीचे आने को तैयार नहीं हैं। सरकार के प्रस्तावों को उन्होंने पहले ही गुमराह करने की चाल बताकर खारिज कर दिया था। उन्होंने कहा, ‘हम वार्ता को तैयार हैं, लेकिन इसके लिए सरकार की ओर से कुछ ठोस प्रस्ताव तो आए।

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किसानों के इस अडि़यल रवैये से वार्ता में गतिरोध बने रहने की आशंका और बढ़ गई है। वहीं कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने एकबार फिर कहा है कि किसी भी आंदोलन का समाधान तो वार्ता की मेज से ही निकल सकता है। बातचीत के लिए किसी शर्त का कोई औचित्य नहीं है। उन्होंने कहा कि ‘कृषि क्षेत्र में जरूरी सुधार लंबे समय से लंबित थे। अब इस दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं। 

 

 

 

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